श्री नवकार महामंत्र का अर्थ
जैन धर्म का महाप्रभावशाली सर्वोच्च व शाश्वत मंत्र है -श्री नवकार महामंत्र
इसे शास्त्रों में "श्री पंचपरमेष्ठी नमस्कार महामंत्र" व "श्री पंचमंगलमहाश्रुतस्कन्ध" भी कहते है ! ये दुनिया का ऐसा पहला मंत्र हैं जिसमे गुणों को पूजा गया हैं,इस महामंत्र के प्रत्येक अक्षर-अक्षर में अद्भुत शक्ति का भण्डार है | तीर्थंकर परमात्मा ने बताया है कि कोई भी सामान्य व्यक्ति शुभ कर्मो द्वारा व राग-द्वैष को छोड़कर चार कषायों क्रोध, मान, माया व् लोभ का नाश करके परमपद मोक्ष प्राप्त कर सकता है |
इस मंत्र में सर्वप्रथम प्रथम पद में "नमो अरिहंताणं" बोला गया है जिसका अर्थ है- अरिहंतो को नमस्कार हो इसमें भूतकाल, भविष्यकाल व वर्तमानकाल में जितने भी अरिहंत (तीर्थंकर) परमात्मा हो गये हैं,
उन सभी को नमस्कार किया गया है |
उन सभी को नमस्कार किया गया है |
द्वितीय पद "नमो सिद्धाणं" है जिसका अर्थ है- सिद्ध भगवंतों को नमस्कार हो, इसमें भूतकाल, भविष्यकाल व वर्तमानकाल में जितने भी सिद्ध भगवंत हो गये हैं उन सभी को नमस्कार किया गया है |
तृतीय पद "नमो आयरियाणं" है जिसका अर्थ है- आचार्य भगवंतों को नमस्कार हो, आचार्य भगवंत 36 गुणों के धारक होते है एवं पांच महाव्रतों का पालन करते है, इसमें भी पूर्व की भांति तीनों कालों में होने वाले आचार्य भगवंतों को नमस्कार किया गया है |
चतुर्थ पद "नमो उवज्झायाणं" है जिसका अर्थ है- उपाध्याय भगवंतों को नमस्कार हो, उपाध्याय भगवंत 25 गुणों के धारक होते है एवं पांच महाव्रतों का पालन करते है, इसमें भी पूर्व की भांति तीनों कालों में होने वाले उपाध्याय भगवंतों को नमस्कार किया गया है |पंचम पद "नमो लोए सव्वसाहूणं" है जिसका अर्थ है- सभी साधु-साध्वीजी भगवंतों को नमस्कार हो, ये पांच महाव्रतों का पालन करते है, इसमें भी भूत, भविष्य व् वर्तमान काल में होने वाले ढाई द्विप में रहे हुये सभी साधु-साध्वीजी भगवंतों को नमस्कार किया गया है |
षष्ठम पद "एसो पंच नमुक्कारो" व सप्तम पद "सव्व पावप्पणासणो" जिसका अर्थ है इन पांचो को किया गया नमस्कार सभी पापों का नाश करता है |
अष्टम पद "मंगलाणं च सव्वेसिं" व नवम पद "पढमं हवई मंगलं" जिसका अर्थ है सभी मंगलो में ये सर्वश्रेष्ठ मंगल है |
अब हम अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय, साधु भगवंतों को समझते हैं -
अरिहंत का अर्थ क्या ?
राजा, महाराजा व् देवताओं से पुजाने योग्य तथा राग-द्वेष रहित व् 12 गुणों से युक्त हैं, गुणों का वर्णन-
1. जहां अरिहंत भगवान का समवसरण होता है,
वहां देवता भगवान के शरीर से बारह गुना ऊँचा अशोक वृक्ष रचते है |
2. देवता पुष्पों की वर्षा करते है |
3. दिव्य ध्वनि से उनकी देशना में स्वर भरते है |
4. देवता भगवान के दोनों और चंवर डुलाते है |
5. भगवान के बैठने के लिए देवता स्वर्ण का सिंहासन रचते है |
6. भगवान के मस्तक के पीछे तेज का संवरण करने वाला भामण्डल रचते है |
7. देवता दुंदुभि बजाते है |
8. भगवान के मस्तक के ऊपर तीन मनोहर छत्र रचते है |
9. भगवान जहाँ विचरण करते है वहां उस क्षेत्र में अनावृष्टि, अतिवृष्टि व रोग या महामारी आदि नहीं फैलते है|
10. भगवान समस्त संसार के स्वरुप को जानते है |
11. भगवान पुजातिशय वाले होते है अतः इनकी पूजा देवताओं में इन्द्रादिक एवं चक्रवर्ती, बलदेव, वासुदेव व बड़े-बड़े राजा- महाराजा भी करते है |
12. भगवान वचनातिशय वाले होते है अतः उनके कथन का अभिप्राय देव, मनुष्य और तिर्यंच(पशु-पक्षी) सभी अपनी-अपनी भाषा में समझ जाते है |
सिद्ध का अर्थ क्या ?
जिसने सभी कर्मो का नाश करके शुद्ध स्वरूप प्रकट किया है, ऐसी आत्मा | सिद्ध भगवंत आठ गुणों से पहचाने जाते हैं :-
1.अनंत दर्शन 2.अनंत ज्ञान 3.अनंत चारित्र 4.अनंत अव्याबाध सुख 5.अक्षय-स्थिति 6.अरुपित्व 7.अगुरुलघु 8.अनंत वीर्य |
आचार्य किसे कहते है ?
जो साधु गच्छ के अधिपति हो, आचार का भली प्रकार से पालन करते हों साधु-साध्वी, श्रावक-श्राविका को आचार व धर्म-पालन का उपदेश देते हो भगवान की आज्ञानुसार सम्पर्क में आने वाले जीवों को धर्म का उपदेश देते हो एवं 36 गुणों से युक्त हो गुणों का वर्णन निम्न प्रकार है -
पांच इन्द्रियों(त्वचा, जीभ, आँख, नाक व कान) को वश में रखने वाले, नवविध ब्रह्मचर्य की गुप्ति को धारण करने वाले, चार कषाय(क्रोध, मान, माया व लोभ) से मुक्त, इस प्रकार के 18 गुणों से युक्त तथा पांच महाव्रतों (अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य व अपरिग्रह) से युक्त, पांच प्रकार के आचारों (ज्ञानाचार, दर्शनाचार, चारित्राचार, तपाचार, वीर्याचार) का पालन करने में समर्थ, पांच समिति(चलने, बोलने, आहार-पानी लेने, वस्त्र-पात्र लेने-रखने, मल-मूत्र परठवने में सावधानी) और तीन गुप्तियों (मन-वचन-काया को पूर्णतया वश में रखना) से युक्त, इस प्रकार छत्तीस गुणों से युक्त आचार्य भगवंत कहलाते हैं |
उपाध्याय किसे कहते हैं ?
जो साधु ज्ञान एवं क्रिया का अभ्यास कराएं उन्हें उपाध्याय कहते हैं ये 25 गुणों से युक्त होते है | 11 अंग एवं 12 उपांग आगम पढ़ाने के तेवीस गुण एवं चरित्र तथा क्रिया का एक-एक गुण |
साधु किसे कहते हैं ?
जो निर्वाण अथवा मोक्ष मार्ग की साधना करते हैं उन्हें साधु कहते हैं,
इनकी पहचान 27 गुणों से होती है :- ये पांच महाव्रतों का पालन करते हैं, रात्रि भोजन का त्याग करते हैं, छःकाय के जीवों की रक्षा करते है, पांच इन्द्रियों पर संयम रखते है, तीन गुप्तियों का पालन करते है, लोभ रखते नहीं, क्षमा धारण करते है, मन को निर्मल रखते है, वस्त्रादि की शुद्ध प्रतिलेखना करते हैं, प्रक्षा उपेक्षादि संयम का पालन करते हैं तथा परीषहों एवं उपसर्गों को सहन करते है |


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